भारत का स्व तंत्र संविधान
- SS Malik
- 17 मार्च
- 1 मिनट पठन

हमारा वर्तमान राष्ट्रीय संविधान विदेशी सिद्धांतों पर आधारित है आऊर यह हमारा तंत्र नहीं है इसलिए इसे स्व तंत्र नहीं कहा जा सकता। इसी कारण से भारत अभी स्वाधीन है परन्तु स्व तंत्र नहीं । वर्षों से हम रिपब्लिक दिवस मानते आए हैं परन्तु भारत न ही तो एक रिपब्लिक है और न ही गणतंत्र । भारत की राज्य व्यवस्था जनतंत्र का एक परिवर्तित स्वरूप दल तंत्र या पार्टी तंत्र है ।
मेरी पुस्तक "भारत का स्व तंत्र संविधान" एक विवेचनात्मक रचना है जो प्राचीन भारतीय दर्शन और शास्त्रों के ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान भारतीय संविधान का मूल्यांकन करती है। वर्तमान संवैधानिक ढांचा औपनिवेशिक काल के कानूनों और यूरोपीय राजनीतिक सिद्धांतों के भारी बोझ तले दबा हुआ है, जो भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से पूरी तरह विच्छिन्न हैं।
पश्चिमी "रिपब्लिक" की तुलना पूर्वी अवधारणाओं को पूर्वी 'राजधर्म' और 'पुरुषार्थ' से करते हुए, पुस्तक यह सुझाव देती है कि आधुनिक राज्य-व्यवस्था अपने प्रशासनिक नियमों और अपने शाश्वत मूल्यों के बीच एक गहरे अलगाव से ग्रस्त है। यह कृति वर्तमान संविधान की 'उधार ली गई प्रकृति' की आलोचना करती है, और न्यायिक विलंब तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार जैसी प्रणालीगत समस्याओं को उजागर करती है। अंततः, यह नए राष्ट्रीय संविधान का प्रस्ताव रखती है, जिसमें शासन का मार्गदर्शन 'प्रज्ञा' द्वारा हो और समाज का संगठन 'धर्म' के सिद्धांतों पर आधारित हो।
भारत के संविधान की प्रस्तावना कुच्छ ऐसी होनी चाहिए ।


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